कथा आलोचना यानि कथा का समाजशास्त्र
1 - प्रकृति की कथा यानि कथा की प्रकृति 2- कथा के संदर्भ में नारी विमर्श 3- कथा विमर्श और आज के जरूरी सवाल 4- कथा का समाजशास्त्र और तीसरी दुनिया 5- राजव्यवस्था व स्वामित्व, कथा के संदर्भ में 6- कुदरती कथाभूमि की उर्वरता का सवाल 7- कौन लिखेगा पुरखों पर कहानियां 8- वनवासी राम के बहाने समकालीन कथासाहित्य पर कुछ बातें 1-प्रकृति की कथा यानि कथा की प्रकृति कहानियों के बारे में बातंे होते ही अतीत की रहस्यमयी परतें खुलने लगती हैं, लगता है कि कहानी कहन का चलन बहुत पुराना है जो भले ही पहले की तरह नहीं पर आज तक चल रहा है। अतीत की परतें खुलते ही अतीत ही नहीं हमारा वर्तमान भी कलैया खाने लगता है, फिर तो अतीत और वर्तमान के बीच अपने पुरखों को लटकता हुआ देख कर मन बेचैन हो जाता है। कभी दादी की याद आती है तो कभी नानी की, पर दादा तथा नाना याद आते ही नही, याद आती हैं नानी और दादी। लगता है कि अतीत या वर्तमान की मानव सभ्यता में कहानियों से जितना मधुर रिश्ता नानी और दादी के रूप में नारियों का रहा है उतना नर रूपी जीव नाना और दादा का नहीं। कहानी कहन के माम...